फर्जी शिक्षक दिवस और शोषक शिक्षक

  • उमराव सिंह जाटव


टीचर्स डे पर मुझे अपने मेथोडिस्ट मिशनरी प्राइमरी स्कूल के ईसाई मास्टर-मास्टरनी, ही याद आते हैं. जी हाँ, उन दिनों टीचरों उर्फ़ गुरुओं को मास्टर-मास्टरनी ही पुकारा जाता था. बाद में छठी कक्षा से लेकर एम.ए. करने तक के किसी मास्टर अथवा मास्टरनी को याद करते ही मुंह कड़वा हो जाता है, उबकाई आती है. 

उत्तरप्रदेश में दादरी से लगभग सटा हमारा गाँव पड़ता है. उत्तर प्रदेश में 10+2 कक्षा तक के स्कूलों को इंटर कालेज कहा जाता है. उसी दादरी के जिस इंटर कॉलेज में छठी कक्षा में मैंने दाखिला लिया था, उसी कालेज में बारहवीं कक्षा तक पढ़ा. स्कूल में विकृत मस्तिष्क ब्राह्मण-क्षत्रिय-बनिया अध्यापकों और विद्यार्थियों से लगभग हर रोज़ लड़ने भिड़ने और मार पीट करने में पढ़ाई से अधिक समय खर्च करते थे हम. हम से अर्थ है मेरे गाँव के सभी जाटव विद्यार्थी. 

बिहार के लेनिन नहीं, फुले-आंबेडकर थे जगदेव प्रसाद


  • मनीष कुमार चाँद 

बहुजन समाज में पैदा हुए जाति से कोइरी (कुशवाहा ) महामानव जगदेव प्रसाद जिंदगी भर ब्राह्मणवादी व्यवस्था के सामाजिक और आर्थिक जकडबंदी से सदियों से पीड़ित शोषित बहुजन समाज  को  मुक्त करने के लिए संघर्ष करते रहे .उन्होंने तेईस वर्ष की उम्र में जब मैट्रिक की परीक्षा फर्स्ट डिविजन से उतीर्ण की थी तो उनके परिवार, समाज के लिए यह गर्व का विषय था. उनके पिता का असामयिक निधन हो चुका था. वे मध्य विद्यालय के शिक्षक थे .श्राद्ध कराने वाला ब्राह्मण आकर बोल दिया कि उनकी असमय मृत्यु में जगदेव प्रसाद का ही दोष है क्योंकि वे अपनी जातिगत पेशा सब्जी उगाना छोड़कर पढने का काम करने लगे हैं. पढ़े-लिखे जगदेव प्रसाद को उस ब्राह्मण की  बात नागवार गुजरी और उन्होंने अपने दादाजी के समक्ष अपना विद्रोह दर्ज कराया और उनके उनके पिता जी का श्राद्ध ब्राह्मण द्वारा नहीं कराया गया बल्कि समाज के लोग इक्कट्ठे होकर केवल शोकसभा का आयोजन कर श्राद्ध कर्म किए. यह एक क्रन्तिकारी कदम था.

जाति उत्पत्ति का भ्रमजाल

  • राजीव पटेल 


भारत में जातियों के नामकरण से संबंधित जितनी भी किताबें लिखी गई हैं, वे अज्ञात काल यानी तथाकथित वैदिक काल की सुनी-सुनाई बातों पर आधारित हैं. ये साहित्य आज से 150-200 वर्षों पूर्व पुस्तक के रूप में लिखा गया था. जातिगत लेखक अपनी पुस्तकों की शुरुआत प्रायः इसी साहित्य के आधार पर करते हैं. जातियों का इतिहास लिखने वाले लेखक सृष्टि निर्माण काल, रामायण काल, महाभारत काल से जाति की उत्पत्ति शुरू करते हुए सीधे मुगल काल (मध्य काल) या अंग्रेजी काल (आधुनिक काल) में पहुंच जाते हैं और अपनी जाति का इतिहास लिखना शुरू कर देते हैं. लेखकगण बीच के प्राचीन ज्ञात काल को न जाने क्यों छोड़ देते हैं, जबकि ऐतिहासिक दृष्टिकोण से ज्ञात काल का समय ही सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत के ज्ञात काल छठी शताब्दी ईसा पूर्व के बाद के काल से ही भारत की सभ्यता और संस्कृति की प्रमाणिक और पुख्ता जानकारी मिलती है. उल्लेखनीय है कि ज्ञात काल के प्रमाणिक और पुख्ता अवशेष प्राप्त हुए हैं, जबकि अज्ञात काल (रामायण-महाभारत काल) के समय का किसी भी प्रकार का अवशेष या प्रमाण आज तक नहीं प्राप्त हुआ है और ना ही उसकी पुष्टि हुई है. यद्यपि कुछ लोग प्राचीन काल के कुछ अवशेषों को जबरदस्ती रामायण-महाभारत काल से जोड़ते हैं, लेकिन ये उनका अन्धविश्वास और अड़ियलपन मात्र है, और कुछ नहीं.

पंडितजी और गोमूत्र


  • विनोद कुमार 


रामू, तू बाल्टी लेकर गाय का दूध निकालने गया था क्या हुआ?

ई लीजिए पंडिज्जी !

अबे ये क्या है?

मालिक हम सुने गाय का मूत दूध से भी कई गुना कीमती और पौष्टिक होता है. तो हम सोचे कि आप यही पीजिए. तो हम बेकार का दूध पी गये और आपके लिये ये कीमती औषधीय ताकतवर गोमूत्र भर लाये.

साले तू दूध पीयेगा और हमे मूत पिलायेगा?

ईश्वर की नाजायज संतानें


  • शकील प्रेम 


रजाई में घुसकर
खूबसूरत सर्दी का
आनंद उठाने वाले
ईश्वर की संताने हैं
शुक्रिया करो
नाम जपो
उस परमात्मा का
जिसने तुम्हें पैदा किया
जायज तरीके से...
और लानत भेजो
उन पर
जिनके लिए
यह खूबसूरत सर्दी
भयंकर ठण्ड में
बदल जाती है

प्यार में जाति


  • शकील प्रेम 


सात साल हो गए
हमारे प्यार के
चलो अब अपने इस प्यार को अंजाम तक पहुंचाते है
शादी के पवित्र बंधन में
दोनों बंध जाते है
लड़के ने
अपनी प्रेयसी की
आँखों में आँखे डाल कहा
प्रेयसी ने
कुछ सोच कर
संडे को
अपने पापा से मिलने
घर आने को कहा

शरमन की समझदारी

  • शकील प्रेम 


इंश्योरेंस कंपनी के दफ्तर में खड़े शरमन को समझाना अब मुश्किल होता जा रहा था. मैनेजर ने शरमन को अपने केबिन में बुलाया. उसे ठंडा पानी पिलाया फिर कहा, "देखो बेटा, तुम्हारी नई गाडी का एक्सिडेंट हुआ. तुमने इंश्योरेंस करवाया था. इंश्योरेंस का यह मतलब तो नहीं कि तुम्हारी गलती का पूरा भुगतान हम ही करें ? दहेज़ में मिले नोट से खरीदी गई बाइक को पहले चलाना तो सीख लेते ? इंश्योरेंस के कागजों में साफ साफ लिखा है कि दुर्घटना होने पर हुई क्षति का साठ प्रतिशत भुगतान ही हमारी कंपनी कर सकती है. तुम्हारे द्वारा भरा गया एक साल का प्रीमियम, जो कुल ग्यारह सौ रुपयों का है और तुम्हारी गाडी की मरम्मत का कुल खर्च दस हजार का है, जिसमे नियमानुसार हम छः हजार रुपये के भुगतान को तैयार हैं. इससे ज्यादा हम कुछ नहीं कर सकते है."

मैनेजर की बात से शरमन पूरी तरह संतुष्ट नहीं था इसलिए मैनेजर ने उसे समझाने का एक दूसरा उपाय निकाला.

भारतीय श्रमण संस्कृति का क्षय

  • कैलाश सारण
प्राचीन भारतीय संस्कृति का मानना था कि सृष्टि का निर्माण एक प्राकृतिक घटना है और सृष्टि के आरम्भ और अंत को मापने का काम काफी दुष्कर है. लेकिन इसके विपरीत ब्राह्मणवादी संस्कृति ये मानती है कि सृष्टि का एक रचयिता है और इसका अंत भी निश्चित है. परन्तु यह बात एक विज्ञान के छात्र के रूप में स्वीकार नहीं कर पा रहा हूँ और इसी प्रश्न का उत्तर पाने का इच्छुक हूँ कि आखिर वास्तविकता क्या है और किसने हमारी वैज्ञानिक सोच को प्रदूषित किया है ? 

इस प्रश्न के उत्तर के लिए सर्वप्रथम हम धर्म को देखते है और भारत की धार्मिक मान्याताओं को देखते हैं. भारत के बारे में जो पहला लिखित वर्णन मिलता है वो है वो ग्रीक भाषा में है क्योंकि अलेक्जेंडर द्वारा हमले से पहले के कोई लिखित शिलालेख या भाष्य उपलब्ध नहीं हैं. यूनानी दार्शनिकों, जिन्होंने अलेक्जेंडर के बाद भारत का दौरा किया है, के लेखनानुसार भारतीय लोग किसी भी तरह से मूर्ति पूजा नहीं करते थे. उनके द्वारा उल्लेखित पूजा का एक तरीका है कि कुछ लोगों द्वारा धर्मोपदेश है, जो नग्न साधुओं (दिगंबर जैन) द्वारा धर्मौपदेश था और वो बताते है कि वो किसी भी देवता की पूजा नहीं करते बल्कि मानव कल्याण पे उपदेश देते थे. वो लिखते है की ये साधु जंगलों में गाँव में विचरण करते रहते थे और जब कभी कोई साधु नगर सीमा में आता था तो वनः राजा भी प्रवचन सुनने जाता था. ग्रीक दार्शनिक स्पष्ट रूप से कोई मंदिरों की पूजा का कोई कोई उल्लेख नहीं करते है. ऐसा ही विवरण हमे चीनी यात्रियों द्वारा लिखे गए यात्रा संस्मरणों में मिलता है.  यहाँ ये उल्लेखित करना आवश्यक है कि जब यूनानी सेना ने भारत पर हमला किया था वो उस समय विभिन्न देवताओं की उनके मंदिरों में पूजा करते थे और इनके अवशेष अभी भी ग्रीस और भूमध्य क्षेत्र में मिलते हैं और इन्हें दुनिया के सबसे पुराने मंदिरों के रूप में माना जाता है इसलिए कोई भी यह सोचता है कि भारतीय मंदिर ही सबसे पुराने मंदिर है वो गलत है क्यूंकि दुनिया के सबसे पुराने मंदिर भूमध्य क्षेत्र में हैं, यानी माल्टा या ग्रीस या मिस्र के मंदिर सबसे पुराने हैं. उन्होंने यह भी लिखा है कि संधू (जो अब सिंधु के रूप में जाना जाती है) और गंगदराई (जो अब गंगा के नाम से जानी जाती है) के डेल्टा के निवासी बहुत बहादुर और शक्तिशाली और न्यायप्रिय हैं और उन्हें जीतना सबसे मुश्किल काम था.

आर्य आक्रमण सिद्धांत का मिथक

  • मनीष कुमार चाँद 


भारतीय इतिहास की यह विडम्बना है कि जो साहित्यिक स्रोत है उसका पुरातत्व नहीं मिलता और जो पुरातत्व में है उसका साहित्य में कोई जिक्र नहीं. भारतीय इतिहासकार, जो अधिकतर द्विज हैं और वामपंथी होने का दावा भी करते हैं, वे केवल अंग्रेज इतिहासकारों को नक़ल करते नजर आते हैं और अंग्रेज इतिहासकार ब्राह्मणी साहित्य में इतिहास खोजते नजर आते हैं. यह इतिहास के ब्राह्मणीकरण का ही परिणाम है कि आर्य-अनार्य की थ्योरी आर्य सभ्यता को सिन्धु घाटी सभ्यता का विध्वंसक घोषित कर उन्हें विजेता घोषित करती है. इस तरह यह गढ़ा गया सिद्धांत ब्राह्मण को शताब्दियों तक चालाकी भरा इतिहास पुरुष घोषित करता है. इस तरह श्रमण सभ्यता के इतिहास को नेपथ्य में फेंक दिया जाता है. वास्तव में भारत का पूरा इतिहास श्रमण-ब्राह्मण संस्कृति का उलट फेर है. 

ब्राह्मण श्रमण की अपेक्षा मजबूत स्थिति में मुग़ल काल और ब्रिटिश काल में ही आ पाता है परन्तु बहुजनों को गलत इतिहास पढ़ा कर सदियों से शोषित होने की ग्लानि की सनातन कुंठा से आच्छादित कर दिया जाता है. भारतीय इतिहास प्रागैतिहासिक काल से शुरू होकर पुरा पाषाण काल, कांस्य युग, सिन्धु घाटी सभ्यता होते हुए आर्यों के आने के बाद फिर से 'आदिमानव' हो जाता है.  है न दिलचस्प बात ? अभी तक तो इतिहस में हम यही पढ़ते आ रहे हैं.

थीसिस चोरी के गुनाहगार राधाकृष्णन

  • महेंद्र यादव 


भारत के राष्ट्रपति पद तक पहुंचे राधाकृष्णन की सारी प्रसिद्धि उनकी पुस्तक इंडियन फिलॉसॉफी के कारण है। आपको यह जानकारी हैरानी होगी कि ये दोनों भाग चुराए गए थे। राधाकृष्णन के लिखे नहीं थे ।
मूल रूप से वह एक छात्र जदुनाथ सिन्हा की थीसिस थी। राधाकृष्णन उस समय कलकत्ता विश्वविद्यालय में प्रोफेसर थे। थीसिस उनके पास चेक होने आई थी. उन्होंने थीसिस पास करने में दो साल की देरी कर दी। बड़े प्रोफेसर थे, इसलिए किसी ने उन पर शक नहीं किया।

इन्हीं दो सालों में उन्होंने इंग्लैंड में अपनी किताब इंडियन फिलॉसॉफी प्रकाशित करवाई, जो कि उसे बेचारे जदुनाथ सिन्हा की थीसिस ही थी। उस छात्र की थीसिस से राधाकृष्णन की किताब बिलकुल हूबहू है...एक कॉमा तक का अंतर नहीं है। जब उनकी किताब छप गई तभी उस छात्र को पीएचडी की डिग्री दी गई। यानी राधाकृष्णन की किताब पहले छपी...अब कोई यह नहीं कह सकता था कि उन्होंने चोरी की। अब तो चोरी का आरोप छात्र पर ही लगता।