खेलों की रिपोर्टिंग में ब्राह्मणवाद

  • महेंद्र यादव 


बहुत शानदार दीपा कर्मकार !!
ओलंपिक में जिम्नास्टिक्स में फाइनल में जगह बनाकर आपने साबित कर दिया कि आप वाकई कर्मकार हैं, करमाकर नहीं. बांग्ला में आपका नाम দীপা কর্মকার ही लिखा जाता है, जो बांग्ला न जानने वाला भी आसानी से पढ़ और समझ सकता है. आप अर्जुन नहीं, एकलव्य की परंपरा को आगे बढ़ा रही हैं, और किसी असत्य या सत्य साईं की भक्त भी नहीं हैं.
दीपा कर्मकार को दीपा करमाकर या कर्माकर क्यों लिख रहे हैं हिंदी और मराठी अखबार?
त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल के हर अखबार उन्हें दीपा कर्मकार यानी দিপা কর্মকার लिख रहे हैं. वहां के चैनल भी यही बोल रहे हैं.

पॉपुलर कल्चर में ब्राह्मणवाद

  • मनीष कुमार चाँद 


मुझे भागवत के हिंदुत्व से डर नहीं लगता, बल्कि आशुतोष गोवारिकर के हिंदुत्व से लगता है. पहले 'लगान', उसके बाद 'स्वदेश' और अब 'मोहनजो दारो'.
'लगान' की कहानी में कचरा की जाति है, मगर नायक भुवन की जाति नहीं है जबकि भारतीय समाज में जाति तो सबकी होती है. कचरा अगर अछूत है तो भुवन निश्चित रूप से सवर्ण है. एक सवर्ण अपने अपमान का बदला संगठित होकर ले सकता है, लेकिन एक कचरा को न्याय तभी मिलेगा जब किसी भुवन टाइप सवर्ण को दया आएगी. पूरी फिल्म गांधीवाद के हिंदुत्व में लिपटी हुई है. कचरा के अछूतपन पर सारा समाज एक मत है लेकिन विद्रोह करता है भुवन !
ऐसा होता है क्या? गोदान तक पढ़ जाइए, ऐसे नायक आपको नहीं मिलेंगे. इस तरह 'लगान' सवर्ण और हिंदुत्व को ही महिमा मंडित करती है. कुछ इसी तरह की थीम पर फ़िल्म 'स्वदेश' भी है.
अब आशुतोष गोवारिकर की एक और फिल्म आने वाली है. 'मोहनजो दारो'. सोचिये कहानी क्या हो सकती है ?

चितपावन ब्राह्मण इज़राइली यहूदी मूल के

आरएसएस की स्थापना चितपावन ब्राह्मणों ने की और इसके ज्यादातर सरसंघचलक अर्थात् मुखिया अब तक सिर्फ चितपावन ब्राह्मण होते आए हैं. क्या आप जानते हैं ये चितपावन ब्राह्मण कौन होते हैं ?

चितपावन ब्राह्मण भारत के पश्चिमी किनारे स्थित कोंकण के निवासी हैं. 18वीं शताब्दी तक चितपावन ब्राह्मणों को देशस्थ ब्राह्मणों द्वारा निम्न स्तर का समझा जाता था. यहां तक कि देशस्थ ब्राह्मण नासिक और गोदावरी स्थित घाटों को भी पेशवा समेत समस्त चितपावन ब्राह्मणों को उपयोग नहीं करने देते थे. 
दरअसल कोंकण वह इलाका है जिसे मध्यकाल में विदशों से आने वाले तमाम समूहों ने अपना निवास बनाया जिनमें पारसी, बेने इज़राइली, कुडालदेशकर गौड़ ब्राह्मण, कोंकणी सारस्वत ब्राह्मण और चितपावन ब्राह्मण, जो सबसे अंत में भारत आए, प्रमुख हैं. आज भी भारत की महानगरी मुंबई के कोलाबा में रहने वाले बेन इज़राइली लोगों की लोककथाओं में इस बात का जिक्र आता है कि चितपावन ब्राह्मण उन्हीं 14 इज़राइली यहूदियों के खानदान से हैं जो किसी समय कोंकण के तट पर आए थे.

संविधान सभा में डॉ. आंबेडकर का समापन भाषण

संविधान सभा के कार्य पर नजर डालते हुए नौ दिसंबर,1946 को हुई उसकी पहली बैठक के बाद अब दो वर्ष, ग्यारह महीने और सत्रह दिन हो जाएंगे . इस अवधि के दौरान संविधान सभा की कुल मिलाकर 11 बैंठकें हुई हैं. इन 11 सत्रों में से छह उद्देश्य प्रस्ताव पास करने तथा मूलभूत अधिकारों पर, संघीय संविधान पर, संघ की शक्तियों पर, राज्यों के संविधान पर, अल्पसंख्यकों पर, अनुसूचित क्षेत्रों और अनुसूचित जनजातियों पर बनी समितियों की रिपोर्टों पर विचार करने में व्यतीत हुए. सातवें, आठवें, नौवें, दसवें और ग्यारहवें सत्र प्रारूप संविधान पर विचार करने के लिए उपयोग किए गए. संविधान सभा के इन 11 सत्रों में 165 दिन कार्य हुआ. इनमें से 114 दिन प्रारूप संविधान के विचारार्थ लगाए गए.

प्रारूप समिति की बात करें तो वह 29 अगस्त, 1947 को संविधान सभा द्वारा चुनी गई थी. उसकी पहली बैठक 30 अगस्त को हुई थी. 30 अगस्त से 141 दिनों तक वह प्रारूप संविधान तैयार करने में जुटी रही. प्रारूप समिति द्वारा आधार रूप में इस्तेमाल किए जाने के लिए संवैधानिक सलाहकार द्वारा बनाए गए प्रारूप संविधान में 243 अनुच्छेद और 13 अनुसूचियां थीं. प्रारूप समिति द्वारा संविधान सभा को पेश किए गए पहले प्रारूप संविधान में 315 अनुच्छेद और आठ अनुसूचियां थीं. उस पर विचार किए जाने की अवधि के अंत तक प्रारूप संविधान में अनुच्छेदों की संख्या बढ़कर 386 हो गई थी. अपने अंतिम स्वरूप में प्रारूप संविधान में 395 अनुच्छेद और आठ अनुसूचियां हैं. प्रारूप संविधान में कुल मिलाकर लगभग 7,635 संशोधन प्रस्तावित किए गए थे. इनमें से कुल मिलाकर 2,473 संशोधन वास्तव में सदन के विचारार्थ प्रस्तुत किए गए.

कुकुरमुत्ता बेनकाब

  
  • डॉ. राजेन्द्र प्रसाद सिंह
निराला की एक लंबी कविता है-"कुकुरमुत्ता". इसमें एक गुलाब और एक कुकुरमुत्ता की कहानी है. प्रगतिवादी आलोचकों ने "गुलाब" को "पूँजीवाद" का तथा "कुकुरमुत्ता" को "सर्वहारा वर्ग" का प्रतीक माना है. यह कविता निराला को प्रगतिवादी कवि माने जाने का सबसे बड़ा सबूत है. सच यह है कि "कुकुरमुत्ता" का "गुलाब" फारसी प्रेरित "मुस्लिम संस्कृति" का प्रतीक है और गुलाब ब्राह्मण प्रेरित "हिंदू संस्कृति" का प्रतीक है. कारण कि "गुलाब" फारसी भाषा का शब्द है और कविता में वह फारस से नवाब द्वारा आयातित भी है. इतना ही नहीं, वह फारसी परंपरा के एक सजावटी उद्यान में खिला भी है. उधर "कुकुरमुत्ता " अपने को "कौलिक संप्रदाय" का मानता है और "गुलाब" को "बकरा संस्कृति" का प्रतीक बताता है. कविता में "गुलाब" के साथ "इत्र संस्कृति" और "नूरजहाँ" जुड़ी हुई हैं तथा "कुकुरमुत्ता" के साथ हिंदू देवी- देवता के अनेक मिथक जुड़े हैं. यही नहीं, तमाम तरह की विश्व व्यवस्थाएँ, दर्शन, संगीत वाद्य, नृत्य भेद, विश्व कवि बड़े-बड़े तथा विश्व भर में फैले अनेकानेक धार्मिक और ऐतिहासिक स्थल, सभी "कुकुरमुत्ता" की परिधि के घेरे में सिमटे हुए हैं. ब्राह्मण प्रेरित हिंदू संस्कृति के ईश्वर की भाँति सर्वव्यापी है वह और सभी उसके शरणागत. कविता के अंत में "कुकुरमुत्ता" को नवाब अंगीकृत करता है. इस प्रकार "कुकुरमुत्ता" ब्राह्मण प्रेरित हिंदू संस्कृति का फारसी प्रेरित मुस्लिम संस्कृति पर विजय-यात्रा की शौर्य कविता है. 

स्त्री अधिकार और आंबेडकर

  • सुजाता पारमिता
आंबेडकर ने कहा था, ‘मैं नहीं जानता कि इस दुनिया का क्या होगा, जब बेटियों का जन्म ही नहीं होगा। ’स्त्री सरोकारों के प्रति डॉ भीमराव आंबेडकर का सर्मपण किसी जुनून से कम नहीं था। छियासी साल पहले, अट्ठाईस जुलाई 1928 के दिन, उन्होंने बंबई विधान परिषद में स्त्रियों के लिए प्रसूति से जुड़े पहलुओं से संबंधित एक महत्त्वपूर्ण विधेयक पेश किया गया था। उसका जोरदार समर्थन करते हुए उन्होंने कहा था कि यह देश के हित में है कि मां को बच्चे के जन्म के दौरान आराम मिले। सरकारी और निजी, दोनों क्षेत्रों के अंतर्गत आने वाले तमाम कारखाने, खदान या ऐसे सभी उपक्रम जहां भारी संख्या में स्त्रियां मजदूरी करती हैं और जो खतरनाक हैं और जिनमें काम करना उनके लिए जानलेवा भी सिद्ध हो सकता है, यह उनकी जिम्मेदारी है कि वे इस खर्च का वहन करें, क्योंकि वे स्त्री श्रमिकों को तभी काम पर रखते हैं, जब उन्हें इससे ज्यादा फायदा होता है।

पार्वती योनि - नेहा नरुका की कविता

ऐसा क्या किया था शिव तुमने ?
रची थी कौन-सी लीला ? ? ? 
जो इतना विख्यात हो गया तुम्हारा लिंग
माताएं बेटों के यश, धन व पुत्रादि के लिए
पतिव्रताएँ पति की लंबी उम्र के लिए
अच्छे घर-वर के लिए कुवाँरियाँ 
पूजती है तुम्हारे लिंग को,

दूध-दही-गुड़-फल-मेवा वगैरह
अर्पित होता है तुम्हारे लिंग पर
रोली, चंदन, महावर से
आड़ी-तिरछी लकीरें काढ़कर,
सजाया जाता है उसे
फिर ढोक देकर बारंबार 
गाती हैं आरती
उच्चारती हैं एक सौ आठ नाम

राहुल सांकृत्यायन और डा. आंबेडकर : सन्दर्भ अछूतोद्धार - कँवल भारती

यह हम देख चुके हैं कि राहुल सांकृत्यायन सनातनी साधु से आर्य समाजी और फिर बौद्ध बने और अन्त में कम्युनिस्ट हो गये थे, जबकि डा. आंबेडकर प्रगतिशील हिन्दू रहे और बाद में उन्होंने बौद्धधर्म ग्रहण कर लिया था। पर, एक समानता थी कि दोनों विद्वान भारत में समाजवादी व्यवस्था स्थापित करने के स्वप्न द्रष्टा थे। यहाँ हम इस प्रश्न पर विचार करेंगे कि अछूतोद्धार की दृष्टि से दोनों के विचार और तरीके क्या थे?

राहुल (1893-1963) और आंबेडकर (1891-1956) दोनों ही समकालीन थे, पर दोनों के कार्यक्षेत्र अलग-अलग थे। दोनों को एक-दूसरे से मिल भेंटने के अवसर बहुत कम मिले थे, शायद एकाध अवसर ही। जिस समय आंबेडकर ने महाड में चाबदार तालाब से पानी लेने के अधिकार के लिये अछूतों का सत्याग्रह (1927) किया था, उस समय राहुल आर्यसमाज के प्रचारक स्वामी थे और ईश्वर तथा वैदिक वर्णव्यवस्था के समर्थक थे। वे वेद और ईश्वर से मुक्त हो 1930 में श्रीलंका में बौद्ध हुए थे। उसके पांच साल बाद आंबेडकर ने येवला में हिन्दूधर्म छोड़ने की घोषणा की थी। इस समय तक भारत में आंबेडकर के नेतृत्व में अछूत आन्दोलन सीधी लड़ाई ;क्पतमबज ।बजपवदद्ध के रूप में आरम्भ हो गया था। इसके भी काफी पहले स्वामी अछूतानन्द का ‘आदि हिन्दू आन्दोलन’ उत्तर भारत में फैल चुका था। किन्तु, इन आन्दोलनों पर हम राहुल का कोई विचार उनकी रचनाओं में नहीं देखते हैं। समाजवाद पर आधारित उनकी प्रसिद्ध पुस्तकें ‘साम्यवाद ही क्यों’, ‘दिमागी गुलामी’, ‘तुम्हारी क्षय’ और ‘भागो नहीं दुनिया को बदलो’ भी 1934 और 1944 के बीच प्रकाशित हुईं थीं। इन पुस्तकों में अछूतोद्धार का जिक्र तो मिलता है, पर वह जिक्र आंबेडकर के आन्दोलन से पूरी तरह अनभिज्ञ दिखायी देता है। इन पुस्तकों में अछूतों का जिक्र भी सतही तौर पर हुआ है। समकालीन कम्युनिस्ट धारा वर्ग-संघर्ष की थी। जाति के सवाल को वह उसी में शामिल मानती थी। उसका विचार था कि क्रान्ति होने पर जाति की समस्या स्वतः हल हो जायगी। अछूतोद्धार को लेकर राहुल का सतही चिन्तन इसी धारा से प्रभावित था। पर, इसके बावजूद उन्होंने ‘तुम्हारी क्षय’ (1939) में ब्राह्मणवाद और हिन्दू धर्म की दकियानूसी रीतियों का खण्डन किया है। इससे वे निस्सन्देह समकालीन कम्युनिस्ट विचारकों में सबसे ज्यादा प्रगतिशील और क्रान्तिकारी नजर आते हैं। पर, क्रान्ति का तेवर अछूतों के मामले में उनमें बहुत कम नजर आता है। जब वे चैंतीस साल बाद 1943 में अपने पितृ ग्राम कनैला गये, तो उन्होंने देखा कि वहां के भर (पासी) समुदाय ने सुअर-पालना बन्द कर दिया था। इस पर उनकी टिप्पणी थी- ‘‘सत्ताईस बरस पहले भर लोग सुअर पाला करते थे, मगर अब सारे जिले में और आसपास के दूसरे जिलों में भी उन्होंने सुअर पालना बिल्कुल छोड़ दिया है। इससे समाज में उनका स्थान पहले से कुछ ऊँचा हुआ है, इसका तो मुझे पता नहीं, हाँ जीविका के एक साधन से वे वंचित जरूर हो गये। सुअरी एक एक बार में बीस-बीस बच्चे देती है और साल में तीन बार। पुष्ट भोजन और पैसे की आमदनी का यह एक अच्छा जरिया था।’’1  

राहुल सांकृत्यायन और डा. आंबेडकर : सन्दर्भ आर्य सिद्धान्त - कँवल भारती

दलित नव जागरण के समय में जो दलितों को रटाया गया था, वह था यह इतिहासबोध कि हमलावर आर्यों ने भारत में आकर यहां के मूल निवासियों पर धावा बोला और उन्हें हरा कर अपने अधीन कर दास बना लिया, वही दास आज के शूद्र और अछूत हैं। दलितों में, उस समय सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले राहुल सांकृत्यायन की किताबों- ‘ऋग्वेदिक आर्य’ और खासकर ‘बोल्गा से गंगा’ की कहानियों ने इस धारणा को और भी मजबूत किया। महाराष्ट्र में दलित आन्दोलन के प्रर्वत्तक महात्मा ज्योतिराव फुले 19वीं शताब्दी में ही इस धारणा को अपनी पुस्तक ‘गुलामगीरी’ में स्थापित कर चुके थे। इसलिये समूचे दलित आन्दोलन ने इसी धारणा को अपना ऐतिहासिक आधार बनाया। इस धारणा को डा. आंबेडकर की पुस्तक ‘शूद्र कौन’ भी खंडित नहीं कर सकी, जो दलित नवजागरण के दौरान ही चन्द्रिका प्रसाद जिज्ञासु के प्रकाशन संस्थान (बहुजन कल्याण प्रकाशन) से 1946 में ही छप कर आ चुकी थी। उसका दूसरा संस्करण 1968 में प्रकाशित हुआ था, जिसकी प्रति इन पंक्तियों के लेखक के पास सुरक्षित है।1 चन्द्रिका प्रसाद जिज्ञासु की 1937 में प्रकाशित पुस्तक ‘‘भारत के आदि निवासियों की सभ्यता’’ के भी 1969 तक छह संस्करण प्रकाशित हो चुके थे और बोधानन्द महास्थिविर का ग्रन्थ ‘‘मूल भारतवासी और आर्य’’ (1930) अनुपलब्ध होने के बावजूद चर्चा में था। इन ग्रन्थों ने दलित वर्गों के मानस पर यह छाप छोड़ने में अमिट प्रभाव डाला था कि भारत के करोड़ों शूद्र और अछूत भारत के उन मूल निवासियों की सन्तान हैं, जो कि प्रागैतिहासिक काल में इस देश में स्वच्छन्दता से निवास करते थे और इस भूमि के स्वामी थे।

राहुल सांकृत्यायन और डा. आंबेडकर : संदर्भ बौद्धधर्म - कँवल भारती

भारत में आधुनिक बौद्धधर्म तीन महान व्यक्तियों का ऋणी है। यानी, जिस बौद्धधर्म को ब्राह्मणवाद ने भारत की धरती से खदेड़ दिया था, उन्नीसवीं शताब्दी में उसका पुनरुद्धार तीन महान लोगों ने किया। ये महान लोग थे- अनागरिक धर्मपाल, महापंडित राहुल सांकृत्यायन और डा. आंबेडकर। धर्मपाल श्री लंका के थे। वे 1891 में भारत आये थे और यहां सारनाथ और बोधगया की दुर्दशा देख कर उनके उद्धार के लिये यहीं रुक गये थे। उन दिनों बौद्धों के तीर्थ स्थल ब्राह्मण महन्तों के कब्जे में थे। लम्बी कानूनी लड़ाई लड़ कर उन्होंने कई बौद्ध मन्दिरों को ब्राह्मणों के कब्जे से मुक्त कराये और बौद्धों को सौंपे थे। सारनाथ में उन्हीं के नेतृत्व में खुदाई कार्य किया गया था और उसी खुदाई के परिणाम स्वरूप आज के धम्मेख स्तूप का अस्तित्व सामने आया था। बोध गया का मन्दिर बौद्धों को सौंपे जाने की लड़ाई भी उन्होंने ही लड़ी थी, जो अभी तक जारी है। यही धर्मपाल जी 1893 में शिकागो में होने वाली विश्वधर्म संसद में स्वामी विवेकानन्द को अपने साथ लेकर गये थे। धर्मपाल जी दर्शन और इतिहास के लेखक नहीं थे, पर भारत में प्राचीन बौद्ध स्थलों को खोजने और उनका पुनरुद्धार करने का एक मात्र श्रेय उन्हीं को जाता है।1

आधुनिक भारत में बौद्धधर्म के पुनरुद्धार पर जब भी चर्चा चलती है, तो धर्मपाल जी का नाम राहुल और आंबेडकर से पहले आता है। धर्मपाल जी ने यदि बौद्ध स्तूपों, विहारों और मन्दिरों का उद्धार और निर्माण कराया, तो राहुल सांकृत्यायन को लुप्त बौद्ध साहित्य की खोज करने का श्रेय जाता है। उन्होंने तिब्बत की यात्रा की और वहां से 18 खच्चरों पर लाद कर बौद्ध साहित्य भारत लाये, जो पटना के संग्रहालय में आज भी सुरक्षित है। यह साहित्य तिब्बती भाषा में है, जिसका उन्होंने संस्कृत और फिर हिन्दी में अनुवाद किया। आज हिन्दी में अधिकांश त्रिपिटक राहुल जी की ही देन है। यदि राहुल जी ने यह महत्वपूर्ण कार्य न किया होता, तो भारत में हिन्दी में बौद्ध साहित्य का सचमुच अभाव होता। लेकिन बौद्ध साहित्य और विहारों का तब तक कोई महत्व नहीं है, जब तक उनकी सुरक्षा के लिये आस्थावान बौद्ध समुदाय का अस्तित्व न हो। भारत में बौद्ध समुदाय के अभाव की पू£त डा. बाबासाहेब आंबेडकर ने की। उन्होंने 14 अक्टूबर 1956 को नागपुर में बौद्धधर्म में धर्मान्तरण करकेे लाखों दलितों को बौद्धधर्म में दीक्षित होने की प्रेरणा दी। इसी प्रेरणा के परिणाम स्वरूप आज भारत में बौद्धों की संख्या लगभग दस लाख है।